Saturday, 3 February 2018

Tum ho

ताज़ा खिले गुलाब के जैसे
गुल-दर-हुई शबाब के जैसे
और नैनों में ख़्वाब के जैसे
और सपनों के उकाब के जैसे

मुस्काती हुई शबनम जैसे
चाँद-मुकम्मल-पूनम जैसे
बजती सुरमय-सरगम जैसे
हैं मदहोश हुए हम जैसे

सदा रहो दर-ख़ुशी-बहार
मिला करे हर शै का प्यार
छाया रहे यारी का ख़ुमार
और ग़म हो सब ज़ार-ज़ार

हँसती हो तो अम्बर बरसे
आँखों से मय झरझर बरसे
साकी का दिल ख़ुद ही तरसे
जब तू निकले अपने घर से

इंद्रधनुष-अभिराम के जैसे
बौर-रसीले आम के जैसे
सर्द रात में घाम के जैसे
थके को हो विश्राम के जैसे

दिल में एक संसार लिए हो
हर शै के लिए प्यार लिए हो
इल्म के तुम भंडार लिए हो
कलम से सबकी हार लिए हो

लिखती हो कविता के जैसे
दिखती हो सरिता के जैसे
तेज़ लिए सविता के जैसे
ईश्वर की दुहिता के जैसे

हर दिन ऐसे मुस्काओ तुम
बोलो मत बस शरमाओ तुम
पर गुस्से में खा जाओ तुम
सबके दिल मे आ जाओ तुम

तुम हो देवों के अमृत जैसी
कभी हो अग्नि में घृत जैसी
कभी हो पावन संस्कृत जैसी
वीणा-तार में झँकृत जैसी

बच्चों के जैसी नि:स्वार्थ
जैसे गीता का हो पार्थ
शब्द करें क्या चरितार्थ
यूँ ही रहो है यही प्रार्थ

और दिल को तुम भोली जैसी
दीपावली और होली जैसी
खट्टी मीठी गोली जैसी
हो तुम आँख-मिचोली जैसी

कुम-कुम चन्दन रोली जैसी
सजी धजी किसी डोली जैसी
मेरी दुआ की झोली जैसी
मीठी प्यारी बोली जैसी

और हो सबसे अच्छी भी तुम
बड़ी सयानी बच्ची भी तुम
पकी हो थोड़ी कच्ची भी तुम
क़ाबिल और हो सच्ची भी तुम

शब्द पड़ेंगे कम कहूँ क्या
साथ हमेशा दोस्त रहो तुम
हर गम अपना मुझको देदो
हर दम हर पल मस्त रहो तुम

#Ashu

Saturday, 4 November 2017

आलिंगन

तुम...

आनन्द अवर्णनीय आलिंगन हो

एक बच्चे की चंचलता सी
और सन्यासी का चिंतन हो

तुम ताज़ा ताज़ा मलयज सी
गोमती ताप्ती सतलज सी
तुम हरी श्वेत केसरिया हो
और चाँद दूध का मिश्रण हो
आनंद अवर्णनीय आलिंगन हो

तुम अविरल छाया हो वट की
और बस्ती हो सागर तट की
तुम विकल्प एकमात्र, प्रश्न का
तुम ही हो आनंद जश्न का
तुम प्रगाढ़ वो प्रेम हमारा
तुम झगड़े तुम अनबन हो ..
आनंद अवर्णनीय आलिंगन हो

तुम इंद्र धनुष आकर्षण हो
तुम प्रकृति का परिवर्तन हो
बस तुम ही हो इतिहास मेरा
और तुम भूगोल का दर्शन हो
आनंद अवर्णनीय आलिंगन हो

तुम बारिश की हर बूँद प्रिये
और बूँद बूँद का प्यासा मैं
तुम शोणित रवि से बनी किरण
तुम धवल चाँद का करो वरण
मैं रक्त-रंग हूँ उजला भी
तुम रंग-प्रभा का ईधन हो
आनंद अवर्णनीय आलिंगन हो

Thursday, 2 November 2017

आओ यौवन बुला रहा है

अति कोमल, चंचल सरिता सी,
रक्त ललित होंठो की लाली
नैन नशे से भरे परे
परे जिनके एक संसार

धीरे धीरे

सबकुछ मुझको भुला रहा है
आओ यौवन बुला रहा है

सेज सजा है फूलों वाला
अरमानो के तकिये पर
छोड़ने आएंगी सखिया
जैसे भोर का कोहरा
सुन्दर चाँद को ...

धीरे धीरे

देखो खुद में मिला रहा है
आओ यौवन बुला रहा है

ये बस एक छन भर है
अमृत टपकेगा अधरों से
प्यासी है धरती मेरी
इसे चाहिए पहली वर्षा
वो वर्षा जिसका
पानी

धीरे धीरे

देखो तुमको भिगा रहा है
आओ यौवन बुला रहा है

Saturday, 30 September 2017

Suno Tum

1
सुनो जो फैसला तेरा है उसपे
गौर कर लो तुम

सितम और जुल्म करना है तो थोड़ा
और कर लो तुम

जमाना मेरा है मुझको सजा होने नही देगा

गिरा के जुल्फें अपनी, दौर अपने
ओर कर लो तुम

2
मुकदमा तुम नही करना उसे मैं जीत जाऊँगा

तुम्हारी बे वफाई के वहाँ मैं गीत गाऊँगा

अदालत को मेरे सुर ही लगेंगे इतने प्यारे कि

तुम्हे वो ही सजा देगा तुम्हे जो मैं सुनाऊँगा

3
किया तुमसे जो मैंने वो कहाँ पर प्यार ढूंढोगे

मुझ सा बे गुनाह क़ातिल कहाँ पर यार ढूंढोगे

उन्होंने जुल्फों और मुस्कानों से ही कत्ल कर डाले

हुआ है क़त्ल जिससे वो कहाँ हथियार ढूंढोगे

Friday, 8 September 2017

चाहता हूँ

बड़े शौक से रखता है दुकानदार बकायेदारों का...
वो हिसाब बनना चाहता हूँ

प्रेमी का प्रेम ग्रन्थ हताश की आश पढ़ने वाले की मनपंसद
एक किताब बनना चाहता हूँ

देखते हो आप मेरे माँ बाप मेरे हितजन जो रात दिन
वो ख्वाब बनना चाहता हू

बिगड़े तो बहुत हैं पैसे वाले भी हैं, हाँ भले ही गरीब
पर नायाब बनना चाहता हूँ

करते हैं बलात्कार वो बेकार कुत्ते जो उनके लिए जलने वाला
वो तेज़ाब बनना चाहता हूँ

एक अच्छा दोस्त अच्छा बेटा अच्छा भाई अच्छा पति भी
और अच्छा बाप बनना चाहता हूँ

पढ़ सकूँ पढ़ा सकूँ सीखा हूँ जो सिखा सकूँ
जानने की प्यास बुझा दूँ
वो आब बनना चाहता हूँ

विशाल हाथी जैसे भ्रष्टाचार को उखाड़ जो फेंके कहीँ
वो उकाब बनना चाहता हूँ

हिन्दू हूँ मुस्लिम हूँ सिख हूँ ईसाई हूँ जयकारा संखनाद प्रणाम हूँ
और इंकलाब बनना चाहता हूँ

Saturday, 19 August 2017

Pyar

आज सोचा तुम्ही से ये है इश्क़ क्यों
लाखों सूरत और सीरत हैं संसार में

मर मिटा तेरे झूठे से वादों पे क्यों
क्यों फनाः यूँ हुआ मैं तेरे प्यार में

ये अदा शोखियां मस्तियां ये मेरी
मेंरी नीलम सी आँखों की मदहोशियां...

मेरा बच्चों सा दिल है कहाँ तू बता
जा मिले तो तू ले लेना बाजार में

मैं हंसा जोर से उसकी इस बात पे
पूरी बच्ची है दिल भी है मासूम सा

कहती परछाई से साथ क्यों हो मेंरे
क्या कमी है मेरे प्यारे से यार में...

चाँद भी छिप गया बादलों में कहीँ
खुद से प्यारा हुस्न गया देखा नहीं

पत्तियों ने भी गिर कर के पतझड़ किया
कलियों ने भी बगीचों में भगदड़ किया

जब सभी खूबियां इसको दे दी खुदा...
क्यों बनाया हमें फिर बेकार में..

हम ने ये सोच कर तुमको चाहा नहीं
कि अप्सरा मेनका हो या हो तुम परी
हम तो मासूमियत पे फ़िदा हो गए
देख के तेरे चेहरे की जादूगरी

चलो तुमको ले के जाऊँ मैं चाँद पे
कब से बैठा हूँ मैं तेरे इकरार में..

Sunday, 13 August 2017

Kanha ka janamdin

जो काम बड़ा मुश्किल है
करना जो ना मुमकिन है

वो पल भर में कर जाये
कन्हैया का जन्मदिन है

जो मुरली कहीं बजाये
कहीं डाल डाल पे कूदे
कहीं गोपी वस्त्र चुराये
घर घुस जाये आँखे मूदे

जो प्रेम लीला के वश में
विष्णु से बालक बनते
कभी मक्खन चोर कहाते
कभी प्रजा के पालक बनते

कुछ कोई नहीं धरती पे
कुछ भी नहीं जिनके बिन है

उस नटखट नन्द किशोरे
कान्हा का जन्मदिन है

वो माँ की डांट है खाते
जो सारी सृस्टि चलाते
वो हर गोपी के साजन
वो सबसे रास रचाते

जो छीर सागर के मालिक
वो यूँ नवनीत चुराते
जिनके वश में है दुनिया
वो गोपियों से घबराते

ये सब उनकी माया है
वो कण कण है तृन तृन है

जो राज दिलों पे करता
नटराज का जन्मदिन है ..