ताज़ा खिले गुलाब के जैसे
गुल-दर-हुई शबाब के जैसे
और नैनों में ख़्वाब के जैसे
और सपनों के उकाब के जैसे
मुस्काती हुई शबनम जैसे
चाँद-मुकम्मल-पूनम जैसे
बजती सुरमय-सरगम जैसे
हैं मदहोश हुए हम जैसे
सदा रहो दर-ख़ुशी-बहार
मिला करे हर शै का प्यार
छाया रहे यारी का ख़ुमार
और ग़म हो सब ज़ार-ज़ार
हँसती हो तो अम्बर बरसे
आँखों से मय झरझर बरसे
साकी का दिल ख़ुद ही तरसे
जब तू निकले अपने घर से
इंद्रधनुष-अभिराम के जैसे
बौर-रसीले आम के जैसे
सर्द रात में घाम के जैसे
थके को हो विश्राम के जैसे
दिल में एक संसार लिए हो
हर शै के लिए प्यार लिए हो
इल्म के तुम भंडार लिए हो
कलम से सबकी हार लिए हो
लिखती हो कविता के जैसे
दिखती हो सरिता के जैसे
तेज़ लिए सविता के जैसे
ईश्वर की दुहिता के जैसे
हर दिन ऐसे मुस्काओ तुम
बोलो मत बस शरमाओ तुम
पर गुस्से में खा जाओ तुम
सबके दिल मे आ जाओ तुम
तुम हो देवों के अमृत जैसी
कभी हो अग्नि में घृत जैसी
कभी हो पावन संस्कृत जैसी
वीणा-तार में झँकृत जैसी
बच्चों के जैसी नि:स्वार्थ
जैसे गीता का हो पार्थ
शब्द करें क्या चरितार्थ
यूँ ही रहो है यही प्रार्थ
और दिल को तुम भोली जैसी
दीपावली और होली जैसी
खट्टी मीठी गोली जैसी
हो तुम आँख-मिचोली जैसी
कुम-कुम चन्दन रोली जैसी
सजी धजी किसी डोली जैसी
मेरी दुआ की झोली जैसी
मीठी प्यारी बोली जैसी
और हो सबसे अच्छी भी तुम
बड़ी सयानी बच्ची भी तुम
पकी हो थोड़ी कच्ची भी तुम
क़ाबिल और हो सच्ची भी तुम
शब्द पड़ेंगे कम कहूँ क्या
साथ हमेशा दोस्त रहो तुम
हर गम अपना मुझको देदो
हर दम हर पल मस्त रहो तुम
#Ashu