क्यों लिखूं मैं?
क्यों हो रहे दुष्कर्म जो
उस नीचता पाप की
क्यों बढ़ाई भाजपा की
क्यों बढ़ाई आप की
नर के मन में व्याप्त विष का
क्यों मैं अब वर्णन करूं
मूक हूँ ! क्यों न बैठ के इन सब
पे बस क्रन्दन करूँ
क्यों लिखू की बुरा ये
जातियों का भेद है
क्यों मैं बंटू ज्ञान जब
पढ़ने को गीता वेद है
हर तरफ जो है गरीबी
वो व्यथा मैं क्यों लिखूं
मर रहे हर रोज भूखे
वो कथा मैं क्यों लिखूं
है कटोरा हाथ में
बच्चे के तो मैं क्या करूँ
है करोड़ो लोग
तो मैं ही क्यों दया करूँ
मुझे उनसे क्या जिन्हें
चना क्या पता नहीं
वो नहीं है धनी इसमें
मेरी तो खता नहीं
लोगों के मन की जरा
कड़वी बुराई क्यों लिखूं
या जो कुछ सच्चे भी हैं
उनकी भलाई क्यों लिखूं
देखते सब लोग है
क्या बुरा सच्चा है क्या
पर सभी के मन में चलता
हमसे क्या हमसे क्या
लिखने जो बुराइयां बैठा अगर
आशु कब शाम और कब सुबह होगी
सोचने का तरीका गर बदल दें
हर बुराई पे हमारी फतह होगी
